Poetry

The lost gaze


The lost gaze

It wasn't so far back,
When 'together' we wove dreams
and patterend them into reality

O, those days of penniless pockets
but Love's overflowing gaze.
Piece by piece building our nest
Hoping someday for a golden harvest.

Sure, like all, I too had dreams
But for Love's sake waved them adieu.
Only one dream...
to make my beloved's dreams all come true.

The golden harvest came!
The penniless pockets now jingled with music!
the nest clothed in fine fabric!

I waited for the same loving gaze
I waited and waited,
Alas!
It was lost in a maze...

Sonia Mehta

रेत पे लिखी कुछ कहानियां


रेत पे लिखी कुछ कहानियां

रेत पे लिखी कुछ कहानियां,
कुछ जानियां, और कुछ अंजानियां

कहीं कुचला हुआ गुलाब, ठुकराई मोहब्बत की दास्तानियां
कहीं नन्हीं उँगलियों से बनी ख्वाबों की बुनवाईयां
कहीं हाथों में हाथ लिए प्रेमियों की दास्तानियां
और कहीं बिछड़े हुए हमसफ़र के क़दमों की निशानियां

इन लहरों में छुपी ज़िन्दगी की गहराईयां
यही तो है उगते डूबते सूरज की परछाईयाँ
इसमे दफ़्न हैं कितने राज़ और कितनी पहेलियाँ
बहुत दिलचस्प क़िताब है ये मौजों की रवानियाँ

कभी आघोश में ले कभी किनारा कर दे, ऐसी इसकी मनमानियां
यह आती जाती लहरें हैं या गीतों की शहनाईयां
कुछ तो रेत में बिखर गयीं, और कुछ अब भी याद हैं मुह ज़ूबानीयां

यूँ तो घंटों बैठ में तुझे देखती रहूं बिन पलक झपकाईयां
तू मरहम ए ज़ख्म भी है और सुक़ून ए दिल भी है रूहानियाँ
तेरा असर भी अजीब है न जानिया
कभी हरक़तें कराये बचकानियां
और कभी मंज़र संजीदा करे अश्कानियां

तेरी फ़ितरत न समझ पाया कोई,यही तो हैं परेशानिया
और जिसने बूझ ली तेरी आनीजानियां
उसपे हैं तेरी मेहरबानियां
रेत पे लिखी कुछ कहानियां
कुछ जानियां और कुछ अंजानियां

सोनिया मेहता